Breaking

रविवार, 17 दिसंबर 2023

रविवार, दिसंबर 17, 2023

हल्बा क्रांतिवीरों ने देश की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है

 *हल्बा जनजातीय इतिहास, संस्कृति एवं शक्ति दिवस* 



 *हल्बा क्रांतिवीरों ने देश की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है*


आदिम जनजातीय समुदाय से लेकर सभ्य समाज अपनी मूल उत्पत्ति का दावा किसी काल्पनिक चरित्र, पौराणिक देवी-देवता अथवा प्राकृतिक पदार्थों से संबंध जोड़कर करता है। हल्बा जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न लेखकों ने कई भ्रांतियों को जन्म दिया है। 


कुछ विद्वानों ने उड़िया राजा के खेत में फसल सुरक्षा के लिए लगे पुतलों में शिव-पार्वती द्वारा प्राण डालने से हल्बा उत्पत्ति का उल्लेख किया है। शिव की कृपा से पुतले हिलने-डुलने लगे और मनुष्य रूप में जीवंत हो उठे। इन जीवंत मनुष्यों ने पहचान के लिए भगवान शिव से अपनी जाति पूछी तो उन्होंने जाति का नाम बताया-हालिबा टा। उड़िया भाषा में हालिबा टा अर्थात हिलने डुलने वाले। हालिबा टा शब्द अपभ्रंश के रूप में हल्बा में परिवर्तित हो गया।

 *हल्बा जनजाति की उत्पत्ति*    



हल्बा उत्पत्ति का संबंध महाभारत के प्रसंग रूक्मणी-हरण से भी जोड़ा जाता है। रूक्मणी हरण के समय जिन योद्धाओं ने बलराम के पक्ष में युद्ध किया था, वे बलराम के प्रिय अस्त्र हल को धारण करने लगे। हलवाहक होने के कारण यह शब्द बाद में कुछ सुधार के साथ अपभ्रंश के रूप में हल्बा में परिवर्तित हो गया। अ़ंग्रेज विद्वान जी.के. गिल्डर हल्बा की उत्पत्ति कन्नड़ शब्द हल्बारू से मानते हैं। जिसका अर्थ होता है-प्राचीन। मिथकीय कथायें और विद्वानों के मत भिन्न हो सकते हैं लेकिन आदिम अर्थव्यवस्था और सभ्यता के विकास क्रम का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि आखेटक स्थिति से कृषि मूलक अर्थव्यवस्था में आगमन के चरण में स्थानांतरित कृषि से स्थायी कृषि अर्थव्यवस्था में जिन आदिम जातियों ने हल को धारण किया, उनके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्थिति में व्यापक परिवर्तन हुआ। हल्बी में शिकार खेलने के लिये पारद खेलतो और स्थानांतरित कृषि के लिए डाही डोसतो शब्द बोलचाल में प्रयुक्त होते हैं।

 *हल और बाहना से हल्बा उत्पत्ति* 



कृषि कार्य में हल की उपयोगिता और चिवड़ा ( पोहा ) के पारंपरिक उपकरण  बाहना से मिलकर हल्बा शब्द का निर्माण हुआ है। हल्बा मूलत: कृषक जनजाति है। अत्यधिक अन्न उत्पादन से शेष बचे धान को हल्बिन महिलायें  उसनकर (उबालकर), हंडी में धीमे आंच में तपाकर मूसल और चाटू की सहायता से बाहना में कूटती हैं। इस प्रक्रिया से चिवड़ा (पोहा) उत्पादित होता है। इस चिवड़ा को हल्बा जाति की महिलायें बाजार में बेचकर घर-परिवार की अर्थव्यवस्था में योगदान देती हैं। चिवड़ा कूटना हल्बा जाति की महिलाओं का पारंपरिक व्यवसाय है।

 *सुख-चिवड़ा का बस्तर की संस्कृति में योगदान* 



चिवड़ा का बस्तर की संस्कृति में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान है। हल्बा समाज के साथ अन्य समाजों में मांगलिक कार्य विशेषकर माहला (सगाई), विवाह के विभिन्न रस्म पूरे होने के पश्चात चिवड़ा गुड़ देने का रिवाज है। चिवड़ा गुड़ ने बस्तर के सभी समाजों को एक सूत्र में पिरोकर सामाजिक सद्भाव में मिठास घोलने का कार्य सदियों से किया है। इसलिये इसे बस्तर में सुख-चिवड़ा के नाम से जाना जाता है।



सरगी (साल) पत्तों के दोनी में चिवड़ा के साथ गुड़ मिलाकर देने का सांकेतिक अर्थ-रस्म विशेष की पूर्णता को बयान करता है। बस्तर के कुछ क्षेत्र विशेष में मुरिया-गोंड समाज के लोग नवाखानी पर्व के अवसर पर हल्बिन महिला के हाथ का बना चिवड़ा ही अपने कुलदेवता में अर्पित करते हैं। 

हल्बा बस्तर की मूल जनजाति है



क्या हल्बा अन्य राज्य से प्रवासित जनजाति है ? इतिहासकार, साहित्यकार और भाषा विज्ञानियों ने बस्तर की भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिदृश्य के समुचित अध्ययन के बगैर हल्बा को काकतीय राजा अन्नमदेव से संबंध जोड़कर वारंगल (तेलंगाना ) से प्रवासित जनजाति का दर्जा दे दिया। वास्तविकता ठीक इसके उलट है। ऐतिहासिक प्रमाण उल्लेख करते हैं कि वारंगल, तेलंगाना में लगातार मुस्लिम आक्रमण से नये साम्राज्य की स्थापना का स्वप्न लिये सन 1317 में चालुक्यवंशी अन्नमदेव ने बस्तर की ओर रूख किया था। कुलदेवी माई दन्तेश्वरी के आशीर्वाद से मात्र 2000 सैनिकों के साथ अन्नमदेव ने बस्तर प्रवेश किया था। जनजातियों के तगड़े प्रतिरोध के बाद सन 1324 में बस्तर में काकतीय वंश की स्थापना हुई।

                 हल्बा बस्तर की मूल जनजाति है। यदि हल्बा काकतीय राजा के साथ वारंगल, तेलंगाना से आये होते, तो निश्चित रूप से हल्बाओं की मातृबोली हल्बी में तेलुगु शब्दों की भरमार होती जबकि हल्बी में तेलुगु शब्दों का पूर्णत: अभाव है। यदि हल्बा वारंगल से सैनिक वेश में आये होते तो निश्चित रूप से महिलाओं, बच्चों और रिश्तेदारों को छोड़कर आये होते और उनके कुल-कुटुंब के वंशज आज भी तेलंगाना में पूर्ण अस्तित्व के साथ आबाद होते लेकिन वर्तमान में वारंगल और तेलंगाना के अन्य स्थानों में हल्बा समाज का अस्तित्व ही नहीं है।                     बस्तर रियासत के दीवान पण्डा बैजनाथ, आर.व्ही.रसेल, हीरालाल और बस्तर भूषण के रचनाकार केदारनाथ ठाकुर अपने लेखों में हल्बा को बस्तर की मुरिया जनजाति उल्लेखित करते है। बस्तर में सदियों से निवासरत अन्य जातियों से हल्बा की उच्च सांस्कृतिक स्थिति के कारण कुछ विद्वान इस जनजाति को अन्य राज्य से प्रवासित बताने की भूल करते हैं। रियासतकालीन प्रथम प्रकाशित ग्रंथ बस्तर भूषण (1908 ) के अनुसार हल्बा बस्तर में आदिकाल से निवासरत 24 जातियों में सांस्कृतिक समृद्धि के मामले में उच्च पायदान पर है।                         काकतीय शासनकाल में विश्वासपात्र सैनिक, राजकीय प्रशासन में भागीदारी और राज परिवार से निकट संपर्क के कारण आचार-विचार,रहन-सहन, वेशभूषा में परिवर्तन से हल्बाओं की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति में सुधार हुआ जिसके कारण समकालीन आदिम और परंपरागत जातियों से हल्बा की स्थिति भिन्नता लिए हुये है। आर. व्ही.रसेल और हीरालाल (1916) लिखते हैं कि हल्बी बोली इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि हल्बा जाति पूर्णत: जनजातीय पृष्ठभूमि से सरोकार रखती है।

 *बस्तर इतिहास में हल्बा समाज का योगदान* 

ऐतिहासिक दृष्टि से बस्तर में 7 वीं शताब्दी से 9 वीं शताब्दी तक नलवंश और नौवीं शताब्दी से 13 वीं शताब्दी तक नागवंश का शासनकाल था। नलवंशी और नागवंशी शासन के दौरान हल्बा राजाओं का उल्लेख मिलता है। प्राचीन बस्तर (चक्रकोट) की राजधानी बारसूर छिंदक नागवंशी राजाओं की समृद्ध विरासत की साक्षी है। नागवंश शासन में ही हल्बी भाषा का जन्म हुआ।

                 काकतीय शासन में  लोकभाषा हल्बी बस्तर रियासत की राजभाषा थी। बस्तर की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था में हल्बा जनजाति का योगदान अतुलनीय है। रियासत काल में दीवान का पद हल्बा व्यक्ति को दिया जाता था। बस्तर राजा के विश्वस्त मंत्रियों और सलाहकारों में पांच नाईक की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती थी।

                ये पांच नाईक राजा के पांच रत्नों के समान न्यायिक कार्य में सहयोग प्रदान करते थे। नाईक, देहारी, दीवान, प्रधान, कुपाल, बाकड़ा, भंडारी, समरथ, मांझी, कुदराम आदि राजाओं की ओर से हल्बा समाज को दिये गये पद हैं, जिसे आज भी उपनाम के तौर पर प्रयोग किया जाता है।


 *बड़े डोंगर हल्बा समाज का प्राचीन काल से मुख्यालय है*      

बस्तर की प्राचीन राजधानियों में से एक बड़े डोंगर हल्बा समाज का प्राचीन काल से मुख्यालय है। अन्य समाज से हल्बाओं में संगठन क्षमता, सैन्यवृत्ति और नेतृत्व गुणों के आधिक्य के कारण ये सदैव राजाओं के भरोसेमंद रहे। इन्हीं गुणों के कारण राजाओं को हमेशा भय रहता था कि कहीं अन्य जातियों को हल्बा शासन के विरुद्ध विप्लव के लिए बाध्य न कर दें।

                लंबे समय तक बड़ेडोंगर को बस्तर की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। अन्नमदेव से लेकर कमलचंद्र भंजदेव तक बस्तर के सभी राजाओं का राजतिलक बड़ेडोंगर में सम्पन्न हुआ है। जिस पत्थर पर नये राजा को बैठाकर राजतिलक की रस्म की जाती है, उस पत्थर को  गादी पखना के नाम से जाना पहचाना जाता है। बस्तर और कांकेर के राजाओं का राजतिलक हल्बा सरदारों द्वारा ही सम्पन्न करने की रियासतकालीन परंपरा है।


 *बस्तर दशहरा में तलवार और राजा के छत्र को लेकर हल्बा चलते है*     


बस्तर में बत्तीस बहना, चौरासी पाड़ देवी-देवताओं की पुरातन परंपरा है। काकतीय शासनकाल से पूर्व नल-नागवंशी काल से ही हल्बा अधिकांश देवी-देवताओं के पुजारी हैं। मावली, दंतेश्वरी और विभिन्न आंगादेव के पुजारी हल्बा हैं। बस्तर दशहरा में तलवार और राजा के छत्र को लेकर हल्बा चलते हैं। राजा के अंगरक्षक के रूप में इनकी प्रतिष्ठा है।

            बस्तर राज की विरासत कालबान बंदूक को दशहरा में कालबानिया हल्बा धारण करता है। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा निर्विघ्न संपन्न हो, इस आशय से नौ दिनों तक उपवास रहकर हल्बा जाति का सदस्य ही जोगी बनकर योग साधना में लीन रहता है। बस्तर रियासत में महत्वपूर्ण नाईक के पद पर राजा द्वारा हल्बा को ही नियुक्त करने की परंपरा है।


हल्बा विद्रोह -(1774-1779)

राजगद्दी को लेकर दो राजकुमारों अजमेर सिंह और दरियावदेव के मध्य उत्तराधिकार युद्ध ने हल्बा विद्रोह को जन्म दिया। अजमेर सिंह राजा दलपतदेव की पटरानी का पुत्र था,जिसे युवावस्था में ही बड़ेडोंगर का अधिपति नियुक्त किया गया था। राजा अपनी सौतेली रानी के प्रेम में पड़कर दरियावदेव को गद्दी सौंपना चाहते थे। राजगद्दी को लेकर छिड़े विवाद में हल्बा सरदारों ने अजमेर सिंह का पक्ष लिया था। हल्बा सेना की सहायता से अजमेर सिंह ने जगदलपुर को घेर लिया था। पहली लड़ाई हल्बा सैनिकों ने जीत ली थी। दरियावदेव को हार के बाद जैपुर राजा के यहां शरण लेनी पड़ी।

                जैपुर राजा एवं ब्रिटिश और मराठों के साथ समझौता के तहत दरियावदेव को विशाल सैन्य सहायता मिली। गठबंधन सेना के बल पर अजमेर सिंह पर दरियावदेव ने आक्रमण कर दिया। लंबी लड़ाई के बाद अजमेर सिंह की हार हुई। भारी संख्या में हल्बा सैनिकों को क्रूरतापूर्वक मार डाला गया। दो वर्षों तक चले युद्ध में 2500 से अधिक हल्बा मारे गये। बंदी सैनिकों को ताड़ झोंकनी जैसा दण्ड दिया गया। कई हल्बाओं को चित्रकोट जलप्रपात में फेंक दिया गया। कईयों की आखें तक फोड़ी गईं।

                कईयों को हाथी के नीचे कुचला गया। दरियावदेव के क्रूर व्यवहार से कुछ ही हल्बा प्राण बचाने में सफल रहे। अंतत: हल्बा सरदारों के साथ दरियावदेव के मध्य समझौते के बाद हल्बा विद्रोह समाप्त हुआ। ऐतिहासिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ में अजमेर सिंह  क्रांति के पहले मसीहा हैं। हल्बा विद्रोह के बाद अस्तित्व संकट ने हल्बा समाज में बिखराव पैदा किया।


 *परलकोट विद्रोह -(1824-25)* 



आदिवासी स्वाभिमान और मातृभूमि की आजादी के लिए परलकोट रियासत के भूमिया राजा गेंदसिंह बाऊ के नेतृत्व में सन 1824 में हल्बा, मुरिया और अबुझमाड़िया आदिवासियों ने तत्कालीन शासन के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका था। जिसे इतिहास में  परलकोट विद्रोह अथवा अबुझमाड़ विद्रोह का नाम दिया गया। विद्रोह ने व्यापक रूप ले लिया था।

            अंतत: ब्रिटिश-मराठा सेना के हस्तक्षेप से विद्रोह पर काबू पा लिया गया। आदिवासियों के पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र तीर-धनुष, टंगिया, फरसा आधुनिक बंदूकों के आगे टिक नहीं सके। विद्रोह के नायक गेंदसिंह को गिरफ्तार कर 20 जनवरी 1825 को  उनके महल के सामने इमली पेड़ पर फांसी दी गई।



            ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार गेंदसिंह छ.ग.के पहले शहीद हैं लेकिन आजपर्यंत तक इस हल्बा वीर को उसके योगदान का वास्तविक सम्मान मिलना शेष है। अखिल भारतीय हल्बा समाज द्वारा प्रतिवर्ष 20 जनवरी को शहादत दिवस के रूप में गेंदसिंह के योगदान को स्मरण किया जाता है।

1910 का भूमकाल आंदोलन और हल्बा समाज का योगदान 

मुरिया राज की स्थापना के मकसद से नेतानार के धुरवा जनजाति के गुंडाधूर के नेतृत्व में 1910 में यह आंदोलन पूरे बस्तर में प्रभावशील हुआ। आंदोलन का बीजारोपण अक्टूबर 1909 में दशहरे के दिन रानी सुबरन कुंअर और लाल कालेन्द्र सिंह द्वारा अंतागढ़ तहसील, जिला कांकेर में स्थित ताड़ोकी गांव के आदिवासी सभा में जनसमूह को संबोधित करने से हुआ।राज परिवार के सदस्यों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों को विद्रोह के लिये प्रेरित किया।

             फरवरी 1910 तक पूरे बस्तर में इस आंदोलन का विस्तार हो चुका था। विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा। भूमकाल आंदोलन में हल्बा समाज के वीरों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। बस्तर को 10 विद्रोह क्षेत्र के रूप में चिन्हित कर सभी जाति समुदाय के लोगों को नेतृत्व सौंपा गया था। दक्षिण बस्तर कोण्टा में विद्रोही नेता के रूप में धनीराम हल्बा को जिम्मेदारी दी गई थी। जगदलपुर क्षेत्र में हरि चालकी और बुद्धू मांझी (कैकागढ़),बस्तर के लिए नाईकगुड़ा के जोगी और जैतगिरी के जयसिंग  को कमान सौंपी गई थी।

            अर्जुन सिंह, सोमनाथ वैध,वीर सिंह बहीदार और नारायणपुर से बहीदार रामधर कुपाल,धरमा पातर ने भी इस आंदोलन में भाग लिया था। भूमकाल आंदोलन के क्रांतिकारियों को सरकार द्वारा आजीवन कारावास से लेकर कठोर से कठोर कारावास की सजा दी गई।सात वर्षों का कठोर कारावास हरचंद नाईक को,चार वर्षों का कठोर कारावास समारू वल्द देवीसिंह हल्बा को एवं धनीराम हल्बा (कोण्टा) को दो वर्षों के कठोर कारावास का दंड दिया गया। अन्य हल्बा वीरों ने भी इस आंदोलन में  बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था लेकिन इतिहास में वे गुमनाम हैं।


 *आजादी की लड़ाई में सुखदेव पातर (पातर हल्बा) की भूमिका* 



महात्मा गांधी से प्रेरित अहिंसक आंदोलन में भाग लेकर हल्बा क्रांतिवीरों ने भी देश की स्वतंत्रता के लिए योगदान दिया है। इन अमर बलिदानियों में ग्राम-भेलवापानी,दुर्गकोंदल, तहसील-भानुप्रतापपुर, जिला-कांकेर निवासी स्व. सुखदेव पातर (पातर हल्बा) का नाम उल्लेखनीय है। सुखदेव पातर का जन्म सन 1892 में ग्राम राउरवाही, कांकेर में हुआ था। इनके पिता का नाम रघुनाथ हल्बा था। इनके पूर्वज बहेटीपदर, डुमरतराई जिला नारायणपुर के हैं, किसी काल में कांकेर क्षेत्र में प्रवासित हुये थे।

                अंग्रेजों की शोषण नीति,अत्याचारी व्यवहार से कांकेर क्षेत्र की जनता में भारी आक्रोश व्याप्त था। 1920 में पूरे देश के साथ छत्तीसगढ़ में भी असहयोग आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। कण्डेल नहर सत्याग्रह में आंदोलनकारियों की हौसला अफजाई के लिए महात्मा गांधी का प्रथम छ.ग.आगमन 1920 में हुआ। सुखदेव पातर अपने दो साथियों इन्दरू केंवट और कंगलू कुम्हार के साथ गांधी जी से भेंट करने कांकेर से पैदल चलकर धमतरी गये। गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर उन्होंने इन्दरू केंवट और कंगलू कुम्हार के साथ मिलकर दुर्गकोंदल क्षेत्र में गांधीवादी तरीके से ब्रिटिश सरकार का विरोध किया था।



                ये तीनों आजादी के मतवाले गांव-गांव घूमकर, चरखायुक्त तिरंगा झंडा लेकर हाट-बाजारों में देशभक्ति का प्रचार कर लोगों को जागरूक करते थे। सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भी सुखदेव पातर ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। महात्मा गांधी के द्वितीय छ.ग. प्रवास 1933 ई. के दौरान सुखदेव पातर, इन्दरू केंवट और कंगलू कुम्हार गांधी जी से मिलने दुर्ग गये। इनके प्रयासों से सुरूंगदोह, भेजलपानी और दुर्गकोंदल आजादी की लड़ाई के प्रमुख केन्द्र बन गये।पातर हल्बा और साथियों की गतिविधियों से कांकेर रियासत का ब्रिटिश प्रशासन भयभीत हो उठा।

                    कांकेर रियासत के अधीक्षक रघुवीर प्रसाद ने 1933 में सुखदेव पातर और साथियों को पकड़ने के लिए दो बार अभियान चलाया।कोड़ेकुरसे बाजार और अन्य जगहों पर इन्हें तलाशा गया लेकिन वे पकड़े न जा सके। सुखदेव पातर के नेतृत्व में स्वतंत्रता की लड़ाई में आदिवासियों को प्रेरित करने खण्डी नदी के पास पातर बगीचा में एक सभा बुलाई गई, जिसमें लगभग दो हजार लोग चरखायुक्त तरंगा झंडा लिये मौजूद थे। इस बैठक में पातर हल्बा और साथियों ने लोगों को आजादी के लिए प्रेरित किया।

                    वर्ष 1944-45 में पातर हल्बा, इन्दरू केंवट और कंगलू कुम्हार के नेतृत्व में कांकेर रियासत के दीवान टी. महापात्र द्वारा भू-राजस्व(लगान) में वृद्धि किये जाने के विरोध में भू राजस्व विरोधी आंदोलन चलाया गया। इन तीनों पर ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करने के कारण राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ और इन्हें सजा भी दी गई। देश आजाद होने पर सुखदेव पातर ने सुरूंगदोह और गोटुलमुंडा गांव में आजादी का खम्भा गाड़कर चरखायुक्त झण्डा फहराया था।

                भारत माता के सच्चे सपूत, आजादी के इस दीवाने का 09 जनवरी 1962 को स्वर्गवास हो गया। अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज  एवं इनके वंशज ढालसिंह पातर द्वारा शासन-प्रशासन से सुखदेव पातर को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा देने की मांग की गई है लेकिन दुर्भाग्य से आज पर्यन्त तक इस देशप्रेमी सपूत को उसके योगदान का वास्तविक सम्मान नहीं मिल सका है।

हल्बा समाज की सामाजिक एवं संगठनात्मक व्यवस्था

वर्तमान में  हल्बा समाज पांच महासभा में विभक्त है। पांचों महासभा के सगा बिरादरों को संगठित करने के उद्देश्य से अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज से सम्बद्ध किया गया है।


18 गढ़ हल्बा समाज

कांकेर शिलालेख 1210 ई.में पहली बार हल्बा पट्टी के रूप में 18 गढ़ों का उल्लेख मिलता है। इससे यह तथ्य प्रमाणित होता है कि अन्नमदेव के सिंहासनारूढ़ होने की तिथि 1324 ई.से पूर्व बस्तर में हल्बा राजाओं का शासन था। डॉ.हीरालाल शुक्ल के अनुसार सन 1465 - 1502 के मध्य बस्तर राजा ने 18 गढ़ों पर कब्जा कर व्यवस्थित करने का प्रयास किया था।इसका तात्पर्य है कि काकतीय शासकों को स्वाभिमानी हल्बा योद्धाओं से अनवरत संघर्ष करना पड़ा था।

                1502 ई. में प्रतापराज देव ने 18 गढ़ों को जीतकर अपने छोटे भाई को बड़ेडोंगर का अधिपति नियुक्त किया था। अजमेर सिंह, दलगंजन सिंह,लाल कालेन्द्र सिंह आदि बस्तर राजपरिवार के सदस्य ही रियासत काल में 18 गढ़ों के स्वामी नियुक्त होते थे। राजशाही काल में इन 18 गढ़ों में राजा द्वारा अपने विश्वासपात्र हल्बा योद्धाओं को  गढ़पति नियुक्त किया जाता था।


 *18 गढ़ हल्बा समाज की सामाजिक व्यवस्था* 

बस्तर अंचल की हल्बा जनजाति ने 18 गढ़ हल्बा समाज महासभा के रूप में स्वयं को संगठित किया है। महासभा का मुख्यालय बड़ेडोंगर है। महासभा द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अध्यक्ष का मनोनयन 5 वर्षों के कार्यकाल के लिए होता है। व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका का गठन कर समाज को सुचारू रूप से संचालित किया जाता है। न्यायिक कार्य के लिए  " पांच नाईक " की व्यवस्था है। न्यायपालिका का अलग से गठन नहीं होता।

                महासभा कार्यकारिणी में संरक्षक,पांच नाईक, अध्यक्ष,उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, महासचिव, संभाग अध्यक्ष होते हैं। सामाजिक उत्थान हेतु युवा, कर्मचारी एवं महिला प्रकोष्ठ का गठन किया जाता है। ग्राम,गढ़, संभाग और महासभा से 18 गढ़ हल्बा समाज की सामाजिक, सांगठनिक व्यवस्था का निर्माण होता है। वार्षिक महासभा में विभिन्न प्रकरणों का निपटारा सर्व बिरादरों की उपस्थिति और सहमति में होता है। एजेंडा का निर्माण महासभा बैठक से पूर्व कार्यकारिणी बैठक में किया जाता है।

                समाज के लिये नियम बनाने का अधिकार ग्राम,गढ़, संभाग को नहीं है। वर्तमान में यह महासभा अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज 18 गढ़ हल्बा समाज मुख्यालय - बड़ेडोंगर के रूप में पंजीकृत है। बस्तर संभाग के अतिरिक्त उड़ीसा के कोकसरा,सिहावा (धमतरी,छ.ग.) और महाराष्ट्र के झाड़ापापड़ा में इस महासभा के सगा -बिरादर निवासरत हैं। 18 गढ़ों में बड़ेडोंगर को माथगढ़ (शीर्ष गढ़) का दर्जा दिया जाता है। द्वितीय गढ़ छोटेडोंगर और तीसरे गढ़ के रूप में नारायणपुर की मान्यता है।


 *पांच नाईक और पंच ईमली* 

बड़ेडोंगर में राजशाही काल में दैवी संस्कार संपन्न करने के लिए राजा द्वारा पांच नाईक को नियुक्त किया गया था।पांच नाईक की उपस्थिति में ही बड़ेडोंगर में दैवी कार्य पूर्ण कराने की परंपरा थी। पांच नाईक की प्रतिष्ठा में वृद्धि होने से राजा द्वारा न्यायिक कार्य में भी इनका सहयोग लिया गया। ये पांच नाईक पांच इमली के पेड़ के नीचे बैठकर न्यायिक कार्य करते थे।

                वर्तमान में ये पंच ईमली के वृक्ष धराशायी हो चुके हैं। पांच ईमली के वृक्षों का समूह संवसार बन्धा बड़ेडोंगर में स्थित था। बड़ेडोंगर से जगदलपुर राजधानी परिवर्तन के बाद बस्तर राजा द्वारा दैवी कार्य का प्रभार सौंपकर तथा अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर इन पांच नाईक को समाज को सौंपा गया था। इन पांच नाईक में प्रधान को सर्वश्रेष्ठ दर्जा प्रदान किया गया था।

                अन्य चार नाईक गागड़ा, कुदराम, समरथ और मांझी हैं। बस्तर अंचल के हल्बा जनजाति में दो वर्ग पाये जाते हैं पुरित/पुरैत/पुरहित और सुरित/सुरैत/सुरहित। पुरित श्रेणी के हल्बाओं ने अपने आपको 18 गढ़ हल्बा समाज से सम्बद्ध किया है जबकि सुरित हल्बा ने अपना पृथक अस्तित्व बनाने के प्रयास में 32 गढ़ हल्बा समाज का निर्माण किया है। हकीकत यह है कि 90 के दशक से पूर्व तक सुरित हल्बा भी 18 गढ़ की ही एक शाखा थी। प्रारंभ में यह वर्ग 18 गढ़ सुरित के नाम से जाना जाता था। बाद में गढ़ों की संख्या बढ़कर 32 हो गई।


 *32 गढ़ हल्बा समाज महासभा* 

महासभा का मुख्यालय बड़ेडोंगर में स्थित है।32 गढ़ हल्बा समाज भी 18 गढ़ की तरह माथगढ़ (शीर्ष गढ़) का दर्जा बड़ेडोंगर को देता है। महासभा कार्यकारिणी में संरक्षक,अध्यक्ष, उपाध्यक्ष,अध्यक्ष ( न्याय समिति ), महासचिव, सचिव, कोषाध्यक्ष एवं कार्यकारिणी सदस्यों का मनोनयन सर्व सम्मति से होता है। युवा एवं महिलाओं के उत्थान के लिए पृथक से प्रकोष्ठ का गठन किया गया है। वार्षिक महासभा में विभिन्न सामाजिक प्रकरणों का निराकरण सर्व सम्मति से होता है।बस्तर संभाग के अतिरिक्त उड़ीसा, महाराष्ट्र के भापड़ा और छत्तीसगढ़ में बिन्द्रानवागढ़ क्षेत्र, धमतरी जिला में इस महासभा के सदस्य आबाद हैं।


 *बालोद महासभा* 

हल्बा क्रांति के बाद समाज में बिखराव उत्पन्न हुआ।कुछ हल्बा समूह बस्तर छोड़ छत्तीसगढ़ क्षेत्र में पलायन कर गए एवं छत्तीसगढ़ी संस्कृति को आत्मसात कर लिया। छत्तीसगढ़ी संस्कृति से प्रभावित हल्बा समाज ने पृथक से महासभा का गठन 1940 में बालोद महासभा के नाम से किया। बालोद महासभा के सगाजन दुर्ग, राजनांदगांव, बालोद, रायपुर, धमतरी  एवं बस्तर के कांकेर जिले में विस्तारित हैं। इस महासभा के हल्बा सदस्यों की भागीदारी सरकारी सेवाओं में सर्वाधिक है।


 *मध्यप्रदेश महासभा (लांजी)* 

मध्यप्रदेश  के बालाघाट, लांजी गढ़, छिंदवाड़ा, सिवनी, मंडला जिले के कुछ क्षेत्रों में हल्बा समाज आबाद है। इन्होंने भी पृथक से महासभा का निर्माण किया है।


 *महाराष्ट्र महासभा (गोंदिया)* 

महाराष्ट्र के गोंदिया,भंडारा एवं नागपुर क्षेत्र में भी बहुतायत से हल्बा समाज आबाद है। मराठी सँस्कृति से प्रभावित ये हल्बा महाराष्ट्र महासभा के नाम पर संगठित हैं और चारों महासभा की तरह अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज से सम्बद्ध हैं। इस महासभा का मुख्यालय गोंदिया में है।


 *समाज का एकीकरण एवं शक्ति दिवस का महत्व* 

हल्बा क्रांति के बाद अस्तित्व संकट ने हल्बाओं को बस्तर से अन्य राज्यों की ओर पलायन के लिए बाध्य किया।जिस हल्बा समूह ने जिस प्रदेश में पलायन किया, वहां की संस्कृति को आत्मसात कर लिया। उड़िसा में बसे हल्बा समाज पर उत्कल संस्कृति, महाराष्ट्र के सगा बिरादर पर मराठी सँस्कृति, छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में बसे समाज पर छत्तीसगढ़ी संस्कृति,और म.प्र.के बालाघाट, छिंदवाड़ा, सिवनी में बसे हल्बा समाज पर बुंदेलखंडी संस्कृति का प्रभाव साफ झलकता है।

            देश के विभिन्न भागों में भिन्न -भिन्न संस्कृति को आत्मसात कर चुके हल्बा समाज को एकता के सूत्र में बांधना भगीरथी प्रयास से कम नहीं है।इस दुष्कर कार्य को करने का जिम्मा अखिल भारतीय हल्बा आदिवासी कर्मचारी प्रकोष्ठ ने अपने कंधों पर लिया।


 *कर्मचारी प्रकोष्ठ का प्रथम अधिवेशन 1991 में भिलाई नगर में हुआ था*       


अखिल भारतीय हल्बा आदिवासी कर्मचारी प्रकोष्ठ का गठन सन 1990 में भिलाई और रायपुर में सरकारी सेवा में कार्यरत समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने किया। कर्मचारी प्रकोष्ठ का प्रथम अधिवेशन 1991 में भिलाई नगर एवं द्वितीय अधिवेशन अप्रैल 1992 में रायपुर में हुआ। अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य था विभिन्न क्षेत्रों में बसे सांस्कृतिक विविधता लिये हल्बा समाज को एकता के सूत्र में बांधकर अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करना।

             1994 में कर्मचारी प्रकोष्ठ के प्रयास से अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज का गठन हुआ। देशभर में बसे हल्बा जनजाति के आचार-विचार, रहन-सहन, रीति-रिवाज एवं धार्मिक मान्यताओं के अध्ययन के बाद सन 1995 में पांचवां अधिवेशन कोण्डागांव में स्वर्गीय एस.आर.एल्मा के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में पहली बार महाराष्ट्र, बालोद और बालाघाट महासभा के सगा बिरादरों को हल्बा संस्कृति और रीति -नीति की जानकारी मिली।


 *हल्बा समाज के प्रतीक और झण्डा को अंतिम रूप से स्वीकृति हेतु 26 दिसंबर 1997 को दिया गया*     



हल्बा समाज के प्रतीक और झण्डा को अंतिम रूप से स्वीकृति हेतु 26 दिसंबर 1997 को अंतिम राष्ट्रीय बैठक 18 गढ़ हल्बा समाज भवन, पत्थरागुड़ा, बड़ेडोंगर में सम्पन्न हुई। इस बैठक में महाराष्ट्र, बालाघाट, बालोद महासभा सहित बस्तर अंचल के 18 गढ़ हल्बा समाज के पदाधिकारी और सगा बिरादर शामिल हुये। बैठक में बालोद महासभा से प्रमुख रूप से श्री बहुर सिंह रावटे, श्री मुन्नालाल ठाकुर, श्री देव प्रसाद आर्य, 18 गढ़ महासभा से श्री लक्ष्मण सिंह प्रधान और स्व.एस.आर.एल्मा एवं 32 गढ़ महासभा से स्व. जलदेव प्रधान की मुख्य भूमिका रही।                 कर्मचारी प्रकोष्ठ के श्री पी.आर.नाईक, श्री जी.आर.राना  श्री, किशन मानकर और श्री ओ.एस.जमदार ने सामाजिक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बैठक में समाज के झण्डे और प्रतीक चिन्ह को मान्यता दी गई। सभी महासभा के सामाजिक सदस्यों ने एक झण्डा, एक प्रतीक, एक भाषा-बोली और संस्कृति को 26 दिसंबर 1997 को मान्यता प्रदान किया। इसी दिन से क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद सभी हल्बा एकता के सूत्र में बंध गये। इस दिन को ऐतिहासिक मानते हुये प्रतिवर्ष 26 दिसंबर को हल्बा समाज राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाता है।

एक समान संस्कृति के पालन से ही समाज में एकता कायम होगी       

सामाजिक एकीकरण एक पेचीदा विषय है। संस्कृति और क्षेत्रीय आधार पर महासभाओं का गठन एकीकरण में बाधक है। बस्तर में आदिकाल से निवासरत हल्बा जनजाति की संस्कृति ही मूल हल्बा संस्कृति है। एकीकरण में बाधक अन्य कारण पांचों महासभा में अहं और वर्चस्व की लड़ाई है। जब तक अहं और वर्चस्व का दंभ बना रहेगा, एकीकरण सुनहरा सपना ही प्रतीत होगा। मेरे विचार से संस्कृति ने सदियों से समाज को जोड़कर संगठित करने का कार्य किया है।

            एक समान संस्कृति के पालन से ही समाज में एकता कायम होगी। आधुनिक युग में रूढ़िजन्य परंपराओं और प्रथाओं का पालन कितनी शिद्दत से कर  पाते हैं ? और जनजातीय समाज की मूल अवधारणा को संरक्षित कर पाने में समाज किस हद तक सफल हो पाया है ? वर्तमान तकनीकी युग में यह यक्ष प्रश्न  समाज के लिए मुख्य चुनौती है। पुन: माई दन्तेश्वरी को स्मरण करते हुये अखिल भारतीय आदिवासी हल्बा समाज को 24 वें शक्ति दिवस महापर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें। जय हल्बा, जय शक्ति।





भागेश्वर पात्र, शिक्षक, साहित्यकार एवं सामाजिक शोधकर्ता,

मो.नं.-9407630523, जिला नारायणपुर, (छत्तीसगढ़)

बुधवार, 2 सितंबर 2020

बुधवार, सितंबर 02, 2020

बस्तर रियासत में हल्बा क्रांति



बस्तर रियासत में हल्बा क्रांति

लेखक :- GOVINDA दिनांक :- Wednesday 02-09-2020 

" बस्तर रियासत 1324 ईस्वी के आसपास स्थापित हुई थी, जब अंतिम काकातिया राजा, प्रताप रुद्र देव ( 12 9 0-1325) के भाई अन्नाम देव ने वारंगल को छोड़ दिया और बस्तर में अपना शाही साम्रज्य स्थापित किया | महाराजा अन्नम देव के बाद महाराजा हमीर देव , बैताल देव , महाराजा पुरुषोत्तम देव , महाराज प्रताप देव ,दिकपाल देव ,राजपाल देव ने शासन किया |बस्तर शासन की प्रारंभिक राजधानी बस्तर शहर में बसाई गयी , फिर जगदलपुर शहर में स्थान्तरित की गयी । बस्तर में अंतिम शासन महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव (1936-1948) ने किया । महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव बस्तर के सभी समुदाय , मुख्यतः आदिवासियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। ‘दंतेश्वरी ‘, जो अभी भी बस्तर क्षेत्र की आराध्य देवी है , प्रसिद्ध दांतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा में उनके नाम पर रखा गया है।
      क्रांति कभी भी किसी आयाम का जन्मदाता होता है भले ही क्रांति किसी भी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हो कालांतर में हल्बा समाज में भी क्रांति विद्रोह पुरातन काल में हुआ है देश काल परिस्थिति किसी भी क्रांति या निर्माण के लिए सहयोग करती है | 
      क्षेत्रीय सामाजिक इतिहास की जानकारी सामाजिक चेतना की धरोहर है प्राचीन बस्तर एक स्वतंत्र राज्य था। बस्तर रियासत में नल वंश गंगवंश छिंदक नागवंश और चालुक्य काक्तिय वंश के शासकों ने शासन की। चालुक्य वंश के 14वें शासक अजमेर सिंह थे। वे चालुक्य नरेश दलपत देव के पुत्र थे। दलपत देव बस्तर रियासत में संभवत 1731 ईसवी से 1974 ईसवी तक शासन किया। दलपत देव की सात रानियां थी, और पटरानी राम कुंवारी के पुत्र अजमेर सिंह थे। 
        रानी कुसुम कुंवारी के पुत्र दरियाव देवता थे। दरियाव देव दलपत देवकी बड़े पुत्र थे, राजा दलपत देव ने दरियाव देव को बस्तर का राजा बनाने के उद्देश्य से अजमेर सिंह को 18 गढ़ बड़े डोंगर का राज्यपाल नियुक्त किया। दलपत देव के इस चाहत को हलबा जाति ने जमकर विरोध किया। 1774 ईस्वी में दलपत देव स्वभाव से उदंड और तेजतर्रार था, इस कारण रियासत में जन आक्रोश राजा की प्रति काफी बढ़ गया। 
        जनाक्रोश के चलते बड़े डोंगर मे बसे हलबा जाति के लोग अजमेर सिंह को बस्तर रियासत का राजा बनाने हेतु जन समर्थन जुटाए, योजना अनुसार अजमेर सिंह 18 गढ़ बस्तर अंचल के हल्बा जाति की सैनिकों के सहयोग से राजा दरियाव देव पर जगदलपुर में हमला बोल दिया। जिसमें दरियाव देव बुरी तरह हार गया। तब अजमेर सिंह हल्बा जाति के सहयोग से बस्तर रियासत के राजा बने। तथा 2 वर्ष तक सफलतापूर्वक शासन किया तथा रियासत में हलबा जाति को मुख्य मुख्य पदों में नियुक्ति मिला परास्त होने पर दरियाव देव पड़ोसी राज्य जयपुर उड़ीसा चला गया समय अंतराल दरियाव देव हार का बदला लेने के लिए जयपुर रियासत के सहयोग से जगदलपुर में चढ़ाई कर दिया जिसे अजमेर सिंह सामना नहीं कर सके तथा बुरी तरह घायल हो गए घायल अजमेर सिंह को हल्बा जाति के लोग उठाकर बड़े डोंगर लाए एवं जड़ी बूटी एवं अन्य दवाइयों के माध्यम से उपचार किया गया। 
        फिर भी अंततः उनकी मृत्यु हो गई अजमेर सिंह की मृत्यु के उपरांत 18 गढ़ के हलबा जाति के लोग दरियाव देवकी विरुद्ध हो गए और विद्रोह करने लगे बस्तर रियासत के इतिहास में यह विद्रोह हल्बा विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध हुआ दरियाव देव ने 1779 ईस्वी में हलवा कांति का रिसेंट पूर्वक दमन किया दरियाव देव की सैनिक बस्तर रियासत में सिर्फ हल्बा जाति के लोगों के साथ ही कत्लेआम लूटमार की हलबा जाति के लोगों को रियासत के सैनिक पकड़ पकड़ कर 90 फीट चित्रकोट (बस्तर) जलप्रपात में फेंक दिए जिसे तत्कालीन समय में 18 गढ़ बस्तर में हल्बा जाति का महाविनाश हो गया इस तरह दरियाव देव ने हलवा क्रांति का बुरे ढंग से दमन किया। 
        बस्तर अंचल में किवदंती है कि हल्बा क्रांति का दमन चक्र जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसा विभत्स था इस हलवा क्रांति विषय पर वर्तमान समय में हल्बा समाज के उच्च शिक्षित नवयुवकों को शोध करना चाहिए ताकि अखिल भारतीय स्तर पर हल्बा समाज को ज्ञात हो सके की प्राचीन बस्तर रियासत में हल्बा जाति का बलिदान हुआ था।
      सभार भुवनेश्वर भारद्वाज 
        अध्यक्ष गढ़ बारसूर "

शनिवार, 18 जनवरी 2020

शनिवार, जनवरी 18, 2020

विवाह योग्य युवक युवतीयों की प्रोफ़ाइल । हल्बा समाज छत्तीसगढ़ / HALBA SAMAJ (C.G)

विवाह योग्य युवक युवतीयों की प्रोफ़ाइल । हल्बा समाज छत्तीसगढ़ / HALBA SAMAJ (C.G):👈इस लिंक पर क्लीक करें

हमारा प्रयास है कि हल्बा जनजाति के सभी महासभा के लोगों को समय की बचत कर कम समय में अपने पसंद की वर एवं वधू ढूंढने में सहयोग करना है अतः आप सभी से विनम्र आग्रह है की आप अपने पास जितने भी हलबा समाज की ग्रुप में तथा अपने परिचित अविवाहित युवक-युवतियों के पास तथा उनके परिजनों के पास यह लिंक व्हाट्सएप एवं फेसबुक के माध्यम से शेयर करें। *धन्यवाद* वेब डिजाइनर 🙏आपके सामाजिक भाई🙏*

शनिवार, 17 नवंबर 2018

शनिवार, नवंबर 17, 2018

जागो बहुजन जागो अपने हक और अधिकार के लिए - ब्राह्मण वाद का अंत हो / jago bahujan jago braman vad ka ant ho

                          🔰मुक्ति का मार्ग🔰

तुम्हारी मुक्ति और उन्नति का मार्ग धर्मशास्त्र व मंदिर नहीं है, बल्कि तुम्हारा उद्धार कड़ी मेहनत करके प्राप्त की गई उच्च शिक्षा व्यवसाय बनाने वाले रोजगार तथा उच्च आचरण व नैतिकता में निहित है। तीर्थयात्रा व्रत पूजापाठ व कर्मकांडों में कीमती समय बर्बाद मत करो। धर्मग्रंथों का अखण्ड पाठ करने, यज्ञों में आहुति देने व मंदिरों में माथा टेकने से तुम्हारी दासता दूर नहीं होगी। तुम्हारे गले में पड़ी तुलसी की माला या कोई ताबीज तुम्हे मुक्ति नहीं दिलाएगी। जो कहीं है ही नही ऐसी काल्पनिक देवी या देवता के पत्थर से बनी पुतला जिसे हम सब मूर्ति कहते है के सामने मथा टेकने या फिर नक रगड़ने से दरिद्रता व गुलामी दूर नहीं होगी। अपने पुरखों की तरह तुम भी चीथड़े मत लपेटो, दड़बे जैसे घरों में मत रहो और इलाज के अभाव में तड़प तड़प कर जान मत गवाओं। भाग्य और ईश्वर के भरोसे मत रहो, तुम्हे अपना उद्धार खुद करना है । धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं है। जो धर्म तुम्हे इंसान नहीं समझता वह धर्म नहीं अधर्म का बोझ है। जहां ऊंच नीच की व्यवस्था है, वह धर्म नहीं गुलाम बनाने की साज़िश है।

डॉ० भीम राव अंबेडकर

.* ब्राह्मण ना तो भूतों से डरता है,
 * ना ही डरता है मरी शमशान से,
 * वो ना डरता है किसी भगवान से,

 * वो डरता है शुद्रों को हक अधिकार देने से।

 * वो डरता है शुद्रो को बराबरी का दर्जा देने से।
 * वो डरता है  एससी, एस टी, ओबीसी से जो शुद्र है,

 * वो कहीं उनसे आगे ना निकल जाये।

 * वो डरता है ऊनके फैलाये हुये अंधश्रद्धा से

 * कहीं एससी, एस टी, ओबीसी बाहर ना निकल जाये।

 * वो डरता है सबकी समानता से,
 * वो सोचता है, अगर कोई नीच ही नही रहेगा तो वो ऊँचा कैसे रहेगा। 


* वो डरता है, एससी, एस टी , ओबीसी से क्योंकि अगर
 * जाति आधार पर आरक्षण दिया जायेगा।
 तो शुद्र अपनी तरक्की कर लेगा।
 * और ऊसकी चुँगल से बाहर निकल जायेगा।
 * खुद जागेगा और औरों को भी जगायेगा।
 * वो ऐसी हर उस बातों से डरता है।

 * कहीं  एससी, एस टी, ओबीसी एक हो गया तो फिर इस देश का नियंत्रण न्यायपूर्ण समानता से संपूर्ण देश
 को चलायेगा और उनका काला चिठ्ठा बाहर निकालेगा।
 और उनको दंडित भी करेगा।

 * इस लिये हर हाल में वह  एससी, एस टी, ओबीसी को कभी एक होने नही देगा।

 * वह हर हाल में अपना प्रभुत्व नही छोडेगा उसके लिए चाहे कितने ही लोग मरे।
 * चाहे देश हजारों साल पीछे चला जाये।
 * उसे अपने स्वामित्व तथा प्रभुत्व से मतलब है।
 * उसे अपनी और अपने समुदाय की छोड
 देश में किसी कि कोई परवाह नही है।

 * देश कि जनता को गंभीरता से सोचना पडेगा।
 * वह कैसे हालात वाला देश चाहती है।

 * सत्ता तख्ता पलट होना चाहीए।
 * अपनी सत्ता  के अस्तित्व रहने के लिए  इन्होंने क्या क्या षडयंत्र किये गये यह सब जनता को पता है।
 * इसके बावजूद भी जनता क्या सोचती है।
 * वह तो जनता जनार्दन पर ही निर्भर है।

 वो डरता है तो सिर्फ,. .. .
 * डा० बाबा साहब भीम राव  अम्बेडकर और उनके संविधान से....

अंधविश्वास, ढोंग,पाखण्ड, असमानता, ढकोसला, छुआछूत बेईमानी, भगाओ सच्चे भारतीय बनो।

 अब भी जातिवाद का जहर बड़ी तेज़ी से बढ़ता जा रहा है जातिवाद खत्म करो।

आज भी एक अनपढ़ पांचवीं फेल पंडित पंडित कहलाता है और दलित Engineer, doctor, professor, scientist, officer, Ph d किया हुआ भी शूद्र या दलित कहलाता है आखिर क्यों अभी तक जातिवाद फैलाया हुआ है।
Download app

🙏 * आदिवासी हल्बा समाज🙏

शनिवार, 3 नवंबर 2018

शनिवार, नवंबर 03, 2018

हल्बा समाज का सामाजिक कैलेंडर / halba samaj ka samajik kailender

 जय जोहार सगा बिरादर मन ला
      सगा समाज को यह बताते हुए अत्यंत खुशी हो रहा है कि हमारे हलबा समुदाय के लिए आदरणीय श्री तुमेश कुमार चिंराम जी ग्राम कोदगांव द्वारा हल्बा समाज के वर्सिक कैलेंडर तैयार किया गया है। चिराम जी कैलेंडर के बारे में बताते हैं कि इस बार हल्बा समाज कैलेंडर में तारीख बार सूर्य और चांद की स्थिति,तिथि वार जयंती , दिवस, त्यौहार और त्योहारों की फोटो भी कैलेंडर में मिलेगा। साथ ही मुहर्त वाहन ,गृह  प्रवेश ,शादी मुहर्त , नक्षत्र आदि दर्शाया गया है । कैलेण्डर के पीछे वाले हिस्से में हलबा समाज से सम्बन्धित कानूनी और संवैधानिक जानकारी के साथ साथ रितिरिवाज और नियम भी जन सामान्य हेतु प्रकाशित की जाएगी। कैलेण्डर की नमूना चित्र आप देख सकते है।

चिराम जी बताते है कि यदि कोई सामाजिक या अन्य भाई अपनी दुकान या कम्पनी की विज्ञापन कैलेंडर में छपवाने के इच्छुक हो तो शुल्क 2000 के स्थान पर केवल 500 रुपए सहयोग राशि प्रदान कर अपना विज्ञापन छपवा सकते है। विज्ञापन देने के इच्छुक साथी मो नंबर 7999054095 पर कॉन्टेक्ट कर सकते है या वॉट्सएप नंबर 9407749514 पर वॉट्सएप कर सकते है। शुल्क भुक्तान हेतु आनलाइन सुविधा उपलब्ध है। सभी भाइयों से अनुरोध है कि आप कैलेंडर छपवाने हेतु पूर्व से हमें आर्थिक सहायता प्रदान करेंगे यानी एडवांस में  शुल्क का भुक्तान करेगे। जितने कैलेंडर का एडवांस हमें प्राप्त होगा उतनी ही मात्रा में छपाई करवाया जाएगा । क्योंकि उधारी कैलेंडर मंगवाने के बाद पैसा के लिए उनके पीछे घूमना पड़ता है तथा कई लोगो का पैसा अभी तक अप्राप्त है। इस असुविधा से निपटने हेतु एडवांस बुकिंग लिया जा रहा है। साथ ही हमारे किसी सामाजिक भाई के पास कैलेंडर में छपवाने योग्य समाज से जुड़ी जानकारी हो तो आप हमें दे सकते है बशर्ते वह सामग्री copyrigh सामग्री न हो स्वयं के द्वारा संग्रहित जानकारी हो।
                💐💐 जय हल्बा जय मां दतेश्वरी💐💐
                                   प्रो.आर्यन चिराम जी

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

गुरुवार, सितंबर 13, 2018

आदिवासी आरक्षण का कर्ज और फर्ज / aadivasi aarkshan ka karj aur farj



                         भारतीय संविधान के शिल्पकार डा . बाबा साहेब अम्बेडकर जी की अध्यक्षता में २६ नवम्बर १९४९ को भारत में संविधान का निर्माण अर्थात जन्म हुआ |दयनीय दशा में जी रहे उन सभी लीगो की जीवन शैली अच्छी अच्छी हो,सभी लोगो को बराबरी में लेन के लिए उन्हें संपूर्ण मूलभूत हक अधिकार मिलने चाहिए इस हेतु २६ जनवरी १९५० को भारत में मानवतावादी ग्रन्थ "मानवतावादी भारतीय संविधान " लागु हुआ (संपूर्ण क्रियान्वयन अभी भी बाकि है )

                                                                           भारत में  "मानवतावादी भारतीय संविधान " लागु होने के पहले ब्राह्मण/हिन्दू सामाजिक व्यवस्था (B.S.O.) मनु का कानून लागु था | जिसमे ऊँची जाति ,नीची जाति ,छुआछूत ,जाति-पाति ,वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र,अतिशूद्र,अछूत,सछुत ) अर्थात सामाजिक क्रमिक असमानता  (ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र,अतिशूद्र,अछूत,सछुत ) उस व्यवस्था में उस अमानवीय कानून व्यवस्था के हिसाब से सभी नीची जातियों और जमातियो को पढ़ने ,लिखने का,वोट डालने का अधिकार नहीं था |

यहाँ तक की जब थूकना होता था तो गले में हांड़ी होना जरुरी था हमारे पैर के निशान जमीन पर न रहे इसके लिए हमारे पूर्वज कमर में झाड़ू बंधकर चलता था | हमारे पूर्वजों की दयनीय दशा और अमानवीय कला क्या था जानने और समझने के लिए "पुस्तक मनुस्मृति " लेखक मनु महाराज मनुवादी का अध्ययन निहायत जरुरी है |

                                            लेकिन अभी हम देख रहे है की मानवतावादी भारतीय संविधान के लागू होने से   (ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र,अतिशूद्र,अछूत,सछुत ) देश के सभी जातियों में समानता आई | मानवतावादी भारतीय संविधान के बदौलत दिनों -दिन सभी नीची जातियों और जमातियो लोगो का उन्नति का मार्ग खुल गया है ,जो की डा .बाबा साहेब अम्बेडकर की देंन  है |जिन्होंने अपने जीवन में अनेक कष्ट झेलकर भी समस्त मूलनिवासियो समाज के लोगो के उन्नति का द्वार खोला |हम उस महान्तावादी,विश्व भूषण भारत रत्न डा .बाबा साहेब अम्बेडकर जी के ऋणी है जो हम आदिवासियों को अनेकानेक मूलभूत अधिकार मानवतावादी भारतीय संविधान आरक्षण =(प्रतिनिधित्व ) के माध्यम से हम आदिवासियों को दिये |
                                                यदि आदिवासी  समाज को अपनी आन्दोलन कामयाब करना है तो जल जंगल जमीन के साथ संस्क्रती और संविधान को जोड़ना होगा और इसे डा . बाबा साहब अम्बेडकर के विचारधारा को आधार देना होगा |
                                            आदिवासी संस्कृति और जमीन पर स्वामित्व इन बातोँ में ही आदिवासी अधिकार प्राप्त होता है |इसलिए हमें अपना जमीन एवम संस्कृति (आदिवासी धर्म) की रक्षा करनी चाहिए अन्यथा गैर आदिवासी बन जायेंगे |
                                            मूल निवासी = ९०% बहुजन समाज = (अनुसूचित जनजातिय , जनजातिय,अन्य पिछड़ा वर्ग,धार्मिक अल्पसंख्यक ) की मुक्ति वैसे ही देश और दूनिया का उद्धार डा . बाबा साहब अम्बेडकर की वैश्विक विचार धारा से  ही संभव हो सकती है |

                                                                                                                 सौजन्य 

                                           हल्बा हल्बी समाज छत्तीसगढ

संविधान डाउनलोड करें

गुरुवार, सितंबर 13, 2018

हल्बी भाषा और बोली / halbi bhansha aur boli


हल्बी भाषा और बोली 

         सादर जय जोहर 
                                   बस्तर अंचल की प्रमुख बोली हल्बी,यद्यपि मराठी,हिंदी के उड़िया का सम्मिश्रण (भाषा वैज्ञानिक शब्दावली में कियोल )है ,तथापि इसे इसके वर्तमान स्वरूप में मराठी ,हिंदी या  उड़िया की बोली मानना अपने आप में एक व्यंगात्मक बात होगी  | यह एक अलग भाषा होती है।आत्येव इस भाषा को साहित्यिक परिनिष्ट भाषा के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से इसके लिए पृथक लिपि "हल्बी लिपि "का सृजन किया गया है | इस लिपि को देवनागरी लिपि में ही परिवर्तन कर बनाया गया है ,ताकि देवनागरी लिपि से परिचित हल्बी भाषी या हल्बी जानने वाला सरलता से इस लिपि को पढ़ सके |
                                                                   विश्व के प्राचीन और वर्तमान लिपियों तथा एक आदर्श लिपि के सम्बन्ध में आवश्यक तत्वों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने के पश्चात इस लिपि का निर्माण किया गया है |यद्यपि देवनागरी लिपि किसी एक भाषा /बोली की लिपि नही है |हल्बी देवनागरी लिपि में भी लिखी जाती है |तथापि हल्बी भाषा के प्रति हल्बी भाषियों के मन में स्वाभिमान उत्पन्न करना और हल्बी में पढ़ना लिखना भी हलबी भाषा के निर्माण का प्रमुख कारण है।                                                       हल्बी भाषा ओडिया और मराठी के बीच की एक पूर्वी भारतीय-आर्य भाषा है। यह भारत के मध्य भाग में लगभग ५ लाख लोगों की भाषा है। इसे बस्तरी, हल्बा, हल्बास, हलबी, हल्वी, महरी तथा मेहरी भी कहते हैं। इस भाषा के वाक्यों में कर्ता के बाद कर्म और उसके बाद क्रिया आती है। इसमें विशेषण, संज्ञा के पहले आते हैं। यह प्रत्ययप्रधान भाषा है। यह एक व्यापारिक भाषा के रूप में प्रयोग की जाती है किन्तु इसमें साक्षरता बहुत कम है।




                                                     इन सबसे अलग हट कर खास तौर पर हल्बा हल्बी आदिवासी समुदाय के सन्दर्भ में जबकि इस समुदाय विशेष को सिर्फ और सिर्फ इसलिए अनुसूचित जनजातीय हल्बा आदिवासी का दर्जा प्राप्त है ,क्योकि इनकी अपनी एक अलग रहन सहन  व् विशेषकर बोली भाषा हल्बी है |और इसी आधार पर इस छोटी सी पुस्तिका हल्बा हल्बी सीखे को प्रकाशित करने की जो योजना है इसका मूल मकसद महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ़ राज्य के लिए घोषित अनुसूचित जनजातीय समुदाय हल्बा आदिवासी साथियों में न केवल जाग्रति पैदा कर हल्बी में लिखने पढ़ने के लिए है बल्कि "हल्बी " को हर तरह हर स्तर पर संरक्षित व् संवर्धित करते हुए भारत के संविधान के अनुच्छेद ३४२ के तहत जहां हल्बा समुदाय को  अनुसूचित जनजातीय समुदाय के रूप में यथावत सुरक्षित बनाये रखना है ,वाही इस हल्बी बोली को संविधान के आठवी अनुसूची के तहत एकभाषा "हल्बी "के रूप में मान्यता दिलाने की दिशा में भी एक अति महत्वपूर्ण दूरगामी पहल है |
                      इस पुस्तिका में जानकारियां है इस हेतु हमारे सहयोगी साथियों मा. विक्रम कुमार सोनी जी और मा. रूद्र नारायण पाणिग्रही जी (जगदलपुर छत्तीसगढ़ ) इन दोनों साथियों ने हमें अति महत्वपूर्ण योगदान दिया है | तथा मा. उत्तम कुमार कोठारी जी (ग्राम खैरवाही ,डौंडी छ.ग.) मा. बालसिंग देहरी जी(ग्राम -बासला,भानुप्रतापपुर ,कांकेर  छ.ग.) ने सहायता की | इसके अतरिक्त आम हल्बा समुदाय के महत्वपूर्ण साथियों  ने अपना नाम न छपवाने के शर्त पर तन मन धन से हर तरह के सहयोग प्रदान किये है हम उन सबका विशेष रूप से आभारी है |
                                                  इस तरह की जानकारी हल्बी को एक भाषा के रूप में विकाश ,संकलन,प्रकाशन तथा बस्तर अंचल की कलाकृतियों का संरक्षण एवम  उन्नयन करने के लिए यह एक दूरगामी वृहद् परियोजना का आधारभूत भाग है | 
                                                                                             

                                                                                                                                 आपका 
                                                                                                                        राधेश्याम करपाल जी  

                                                              
गुरुवार, सितंबर 13, 2018

एक मिसाल इमानदार नेत्तृव की / ek misal imandar netritv ki

एक मिसाल इमानदार नेत्तृव की




नाम - श्री  झाडूराम रावटे               
पिता - स्व. श्री हटोईराम रावटे 
जन्मतिथि एवम् स्थान - १० फ़रवरी , १९२८ / संबलपुर 
निधन - २६ जनवरी १९९८ 
शैक्षणिक एवम् व्यावसायिक योग्यता - मैट्रिक 
वैवाहिक - कृषि 
अभिरूचि - जनसेवा 
भाषाओं का ज्ञान - हल्बी , हिंदी , छ्त्तीसगढी 
स्थायी पता - ग्राम / पो. - संबलपुर , तह. - भानुप्रतापपुर , जिला - बस्तर 
                                                         आप आदिवासी नेतृत्व के तीनो गुण ईमानदारी , साहस और जागरुकता से सदैव ओत - प्रोत रहे है जिसके वजह से सभी जानों के बीच आप नेता के नाम से लोकप्रिय रहे और इसी लोकप्रियता के चलते ३२० सीट वाली मध्यप्रदेश विधान सभा में २ बार , एक बार झोपडी और दुसरी बार मुर्गा छाप में एक मात्र स्वतंत्रत उम्मीदवार के रूप में चुनकर भानुप्रतापपुर के विधयाक रहे है |
                                                                                                         जो लोग आज आदिवासी  नेतृत्व के लिए ढोंग करते है उन्हें श्री झाड़ूराम रावटे के जीवन चरित्र से सिख लेना चाहिए, कि ईमानदारी भी कोई चीज होती है ? और आप में ईमानदारी इतना था कि आपने कभी धन संग्रह नहीं किया
आपने अपने नाम पर ना  कोई बैंक बैलेस रखा और ना कोई फ्लैट रखा | आपने एक मात्र प्लाट जो भानुप्रतापपुर में स्थित है शासकीय तौर पर आबंटित है | और आपने जीवन काल में सक्षम होतो हुए भी इस पर कई बंगला या फ्लैट नही बनाया | और आप न केवल एक साधारण जीवन जिये बल्कि आप सदैव ही सम्पूर्ण आदिवासी समुदाय के लिए बिना किसी भेदभाव के दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनके विधिक , मौलिक , संवैधानिक  एवम् मानवीय अधिकारों के लिए समर्पित  रहे है तथा अपना सब कुछ जरुरतमंदो के लिए कुर्बान कर दिया |जो आज बेहद प्रासंगिक और हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत है |
                                                                                  छत्तीसगढ़ के उन महान विभूतियों मा.श्री दुलार सिंग भोयर जी ,ग्राम - चिखलाकसा (दल्ली राजहरा )मा.श्री जी .आर .कोमिया जी बालोद  मा. गंगोत्री बाई करपाल चवेला (भानुप्रतापपुर ) मा. लक्ष्मी बाई कोठारी ग्राम -खैरवाही (दल्ली राजहरा ) को समर्पित है जिन्होंने आजीवन आम आदिवासी हल्बा समुदाय के एकता,अखंडता ,और भारतीय संविधान के मूल सिद्धांत -समता ,स्वतंत्रता ,न्याय व भाईचारा के लिए कम किये और अब भी कर रहे है |  



मंगलवार, 11 सितंबर 2018

मंगलवार, सितंबर 11, 2018

अबूझमाड़ की व्यथा की अनसुलझी कहानी / abujhmad ki ansuljhi kahani

अबूझमाड़ की व्यथा की अनसुलझी कहानी 

दुनिया के दखल से दूर ,घने जंगलो की रहस्यमयी ओंट में खुद को सहेजे 
अबूझमाड़ के समाज ने क्या पाया ? आज ये सोचनीय है की दुनिया समय के कल्वतो के साथ कितनी आगे बढ़ चुकी है और इसी दुनिया की एक हिस्सा ऐसा है की वहा आज भी लोगो की मूल भुत सुविधाए जैसे शिक्षा इत्यादि से वांछित है |शेष दुनिया जिसे विकास का नाम देती है,वह आक भी इनके लिए मशीनी है ,बेईमानी है |वे जिसे विकास कहते है,वह खलिश है नाइंसाफी |इंसानियत बड़ी चीज है वाही पीछे छुट गई तो कैसा विकास ? अबुझमाड़ हमें आइना दिखा रहा है,संकीर्ण ,एकांकी और विकृत होते संवेदनहिन् महानगरीय समाज को सिख दे रहा है |
              किसी ने सच ही कहा है कि इसे देख सिने  में जलन सी होती है की हाय रे मेरा देश तुझे देख मुझे एक कविता आती है :- सिने  में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है ,
                           इस देश में हर शख्स परेसान सा क्यों है |
                                      दिल है तो धड़कने का बहाना कोई दुन्ढ़े ,
                                      पत्थर की तरह बेहिस -ओ बेजान क्यों 
                           तन्हाईयों  की ये कौन सा अंजिल है रफीक ,
                           ता हद ये नजर एक बयान सा क्यों है |
                                      क्या कोई बात नयी नजर आती है हममे ,
                                         आइना हमें देख के हैरान सा क्यों है |

              आइना दिखाता  अबुझमाड़                                      

                    देश की राजधानी दिल्ली दुनिया की कमाऊ और विकसित शहरो की दौड़ में है | लेकिन इसी दिल्ली की सड़ांध मरती संकीर्ण बस्तियों में भूख से मौत की खबर आती है | दूसरी ओर दश की सबसे पिछड़े माने  जाने वाली छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल अबुझमाड़ में न तो भूख से कोई मरता है , न यहाँ वृद्धाश्रम है ,न अनाथालय ,न बेसहारों के लिए कोई शेल्टर होम की दरकार है |

                              सहकारिता में गुंथा हुआ है यहाँ का अद्भुत सामाजिक ताना बाना| इनका सामाजिक ढांचा नई  दिल्ली की मार्डेन सोसायटी के मुकाबले कही अधिक मजबूत ,अधिक जिम्मेदार और अधिक संवेदनशील है | जहा बेसहारों ,विधवाओं व् बुजुर्ग जानो का तिरस्कार नहीं होता है | जहा कोई पराया नहीं होता ,सभी अपने ही होते है | सहकारिता की मजबूत ताने बने में गुंथे हुए इस व्यवस्थित समाज को अति विकसित समाज कहने में कोई संशय की बात नहीं होगी |देश दुनिया के लिए अजूबा ही सही पर बस्तर संभाग के करीब चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला अबुझमाड़ भले ही देश दुनिया के लिए अजूबा हो , लेकिन यंहा का सामाजिक ढांचा बेमिसाल सहकारिता की सिख देती है |यंहा के गाँवो में कोई भूखा नहीं रह सकता क्योकि सभी को सभी की फ़िक्र है |ठीक इसका उल्टा विकसित शहरो में बफैलो पार्टी का बचा खाना कचरों में फेकी जाती है जब खा नहीं पाते तो इतना खाना लेते ही क्यों है | पर इन्हे क्या पता की इनके इसी  मुठी भर चांवल से किसी जान बच सकती है  पर इन्हें किसी की जान की क्यों फिकर रहे |

                                                                    ये सच है कि  अबुझमाड़ वन वासियों का क्षेत्र है अबुझमाड़यो का क्षेत्र है पर सुच कहू दोस्तों ये दिल वालो का क्षेत्र है यहाँ कोई अकेला नहीं बस्तर के मानवविज्ञानी डाक्टर राजेन्द्र सिंह जी बतात्ते है कि अबुझमाडिये नि: शक्त ,विधवा ,बेसहारा व् बुजुर्गो की सेवा के लिए कटिबद्ध रहते है |दिव्याग अथवा ऐसा कोई व्यक्ति जो अपनी खेती नहीं कर सकता ,उनके खेती के काम गाँव के लोग ही करते है और उनका भरन पोसन करते है |कोई व्यक्ति अपना मकान   अकेला नहीं बनाता है ,नहीं मजदूरो की जरुरत पड़ती है ,पूरा गाँव उस व्यक्ति को आशियाना बनाने में मदद करती है //|
                              लजीज खान पान  और तडके से कोषों दूर :- हर तरह के तडके से दूर इन  लोग दुनिया प्रकृति के बेहद करीब है |शाकाहारी हो या माँसाहारी ,वे भोजन पकाने के लिए कभी भी तेल का उपयोग नहीं करते |पानी से ही भोजन पकाने के तरीके को ही सेहत के लिए उपयुक्त मानते है |बिएमओ डाक्टर बी.एन.बनपुरिया जी मानते है कि मडियो की खान पान के तौर तरीके बेहद सटीक होने के कारण उन्हें हार्ट अटैक की दौरा नहीं के बराबर पड़ती है |
                                                           दुनिया के फरेब से परे एक सच्ची दुनिया अबुझमाड़ के लोग प्रकृति प्रेमी है |उनका पशु पक्षियों से भी गहरा रिश्ता है |माड. के अधिकांश घरो में मयूर पालन की जाती है हर आँगन में मोर के लिए एक अलग से कमरा बनाया जाता है |कुत्ता ,बकरी,गाय ,भैस ,बन्दर,बटेर ,बतख ,कबूतर आदि भी घरो में स्वतंत्र ही पाले जाते है ,बिना एक दुसरे को नुकसान पहुचाये |मेटानार ,ब्रेहबेड़ा ,दोदेरबेडा ,कदेर ,दह्काड़ोर ,ढ़ोदेबेदा ,तुडको ,इरेपानार ,समेत अन्य गावो में यह नजारा देखा जा सकता है |
                                                                 ये नहीं हो सकता अबुझमाड़ के अबूझ कहे जाने वाले माडिया आदिवासी रामजी राम धुव ,गुड्डू नुरेटी और प्रताप मंडावी को जब जुलाई के दुसरे पखवाड़े में नई दिल्ली में भूख से तीन बच्चियों की मौत की बात बताई गई तो उनके आशचर्य का ठिकाना न था कि दिल्ली में भी ऐसा हो सकता है वे मानने को तैयार ही न थे देश की राजधानी में भी ऐसा हो सकता है | 

READ YOUR LANGUAGE